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जलवायु परिवर्तन के चलते बढ़ती गर्मी का असर फसलो व बागवानी में सबसे अधिक हो रहा है

By Narendra Singh Bisht | 24,April,2026 (Updated: 24,April,2026)
जलवायु परिवर्तन
सेब की खेती
उत्तराखंड
बागवानी
हाई डेंसिटी खेती
जलवायु परिवर्तन के चलते बढ़ती गर्मी का असर फसलो व बागवानी में सबसे अधिक हो रहा है

बढ़ती गर्मी और सूखे का बागवानी पर असर, विशेष रूप से उत्तराखंड में सेब की खेती और इसके बचाव के उपाय।

जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी का प्रभाव

बढ़ती गर्मी के प्रकोप का असर हर किसी पर पड़ता है इससे केवल मनुष्य ही नहीं अपितु जानवर, जंगल के साथ हमारी खेती व बागवानी भी प्रभावित होती है। वर्ष 2026 में राज्य में बढ़ती गर्मी और सूखे का सबसे ज्यादा असर बागवानी की फसल पर दिखाई दे रहा है। अत्यधिक तापमान और बेमौसमी गर्मी के कारण पैदावार में 20-25% तक कमी आ रही है।

चिलिंग आवर्स और उत्पादन पर प्रभाव

स-समय बर्फबारी न होने और दिन के समय बढ़ते तापमान के कारण उत्तराखंड राज्य में सेब के बगीचों में 'चिलिंग आवर्स' पूरी नहीं हो पा रही है, जिससे फूल समय से पहले आने के चलते उत्पादन प्रभावित हो रहा है। इससे सिर्फ सेब ही नहीं मैदानी क्षेत्रों में आम और लीची के आकार और गुणवत्ता भी प्रभावित हो रही है।

सेब की उत्पादकता में गिरावट

बढ़ती गर्मी/जलवायु परिवर्तन के चलते सेब की खेती पर नकारात्मक असर जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड जैसे पारंपरिक सेब उत्पादक क्षेत्रों में दिखाई दे रहा है। जिसके चलते सेब की उत्पादकता में पिछले कुछ दशकों में लगभग 11% तक की कमी आई है। सेब के रंग व गुणवत्ता में कमी हो रही है जो इसके बाजार मूल्य में कमी लाने लगा है। पर्वतीय क्षेत्रों में जल संकट होने के चलते सेब के आकार में गिरावट आयी है साथ ही बगीचों में नए प्रकार के कीट और बीमारियां का प्रकोप भी अधिक होने लगा है।

गुणवत्ता और शेल्फ लाइफ

जलवायु परिवर्तन के चलते सेब सामान्य समय से 1.5 से 2 हफ्ते पहले ही पकने लगे हैं जिससे गुणवत्ता प्रभावित होने के साथ सेब की शेल्फ लाइफ कम हो गई है परिणामस्वरूप उत्पादन जल्दी खराब हो रहे हैं।

हाई डेंसिटी सेब की खेती और लागत

भारत में 01 एकड़ भूमि में हाई डेंसिटी सेब के 1000 पेड़ लगाने की शुरुआती लागत लगभग ₹15 लाख से ₹20 लाख तक आंकी गई जो पारंपरिक खेती की तुलना में काफी अधिक होती है इसमें अच्छी गुणवत्ता वाले ग्राफ्टेड पौधे ट्रेलिस सिस्टम व ड्रिप सिंचाई प्रणाली की सुविधा शामिल है।

सरकारी प्रोत्साहन और एप्पल मिशन

सरकार हाई डेंसिटी बागवानी पर 50% से 75% तक की सब्सिडी दी जा रही है जिससे अधिक से अधिक लोग लाभान्वित हो सके। यदि प्रबंधन सही हो तो हाई डेंसिटी में 2-3 साल में फल आने शुरू हो जाते हैं व 5वें वर्ष में प्रति एकड़ लगभग 13-15 टन का उत्पादन मिल सकता है। उत्तराखंड में सेब उत्पादन के प्रमुख उत्पादक जिले उत्तरकाशी, अल्मोड़ा, नैनीताल, पिथौरागढ़ और टिहरी गढ़वाल है वही प्रसिद्ध स्थान हरसिल (उत्तरकाशी), रामगढ़ और मुक्तेश्वर (नैनीताल) में है। अल्मोड़ा का चौबटिया एशिया का सबसे पुराने सेब बागान में से एक है यह लगभग 107 हेक्टेयर में सक्रिय है। राज्य सरकार द्वारा 'एप्पल मिशन' के तहत सेब की खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

डॉक्टर नारायण सिंह के अनुभव और सुझाव

नैनीताल जनपद के रामगढ़ में उच्च घनत्व वाले सेब के बागीचे हैं। वही सेब के शुरुवाती काश्तकार ग्राम मानघेर से डॉक्टर नारायण सिंह अपने अनुभवों को बताते हुए बताते है उनके द्वारा वर्ष 2022 से इस पर कार्य किया जा रहा है उनके बगीचे में वर्तमान में 2000 पेड़ है। वह बताते है वर्तमान समय में अत्यधिक गर्मी के चलते सेब उत्पादन में कमी आ रही है जिसके नियंत्रण हेतु निम्न कार्य किए जा सकते है:

  • मल्चिंग: पेड़ के तने के चारों ओर 2-3 इंच सूखी घास, पत्तियां या लकड़ी के बुरादे की परत बिछाएं जो मिट्टी को ठंडा रखकर नमी को सूखने से बचाता है।

  • सिंचाई: पेड़ को गहरी और नियमित सिंचाई दी जानी चाहिए विशेष रूप से गर्मी के महीनों में।

  • सनबर्न से बचाव: धूप से तने को सनबर्न से बचाने के लिए सफेद रंग का पेंट या चूना, कॉपर सल्फेट और पानी का मिश्रण (Tree Paste) तने पर लगाएं।

  • छायादार जाल: यदि पेड़ छोटा हो तो दोपहर की तेज़ धूप से बचाने के लिए छायादार जाल लगाए।

  • खाद का प्रयोग: रासायनिक खाद का प्रयोग न करे इससे पेड़ सूख जाता है।

  • छंटाई: गर्मियों में घनी शाखाओं को हल्का छांटें ताकि हवा का प्रवाह बना रहे।

Conclusion

वर्तमान समय में बढ़ते तापमान के चलते लगातार फसलों को नुकसान हो रहा है यह सभी के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। कोशिश करें ऐसी चीजों का उपयोग कम करें या न करें जो जलवायु परिवर्तन में सहायक हों।

Narendra Singh Bisht
Narendra Singh Bisht

हल्द्वानी

लेखक का उद्देश्य भारतीय कृषि और किसानों के जीवन से जुड़ी सच्ची और सरल बातें लोगों तक पहुँचाना है। यह लेखन गाँवों की चुनौतियों और मेहनत को सामने लाने की कोशिश करता है, ताकि लोगों को खेती-किसानी की असली स्थिति समझ में आ सके। लेखक चाहते हैं कि इनके माध्यम से किसानों की आवाज़ सुनी जाए और समाज में जागरूकता बढ़े।

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