
आधुनिकीकरण ने पर्वतीय खेती को मिश्रित रूप से प्रभावित किया है। इसके चलते उत्पादन में वृद्धि के साथ-साथ मृदा क्षरण, पारंपरिक फसलों की कमी, और छोटे किसानों के सामने तकनीकी एवं आर्थिक चुनौतियों में इजाफा देखने को मिल रहा है। भले ही यह उत्पादकता तो बढ़ा रहा है, लेकिन पारिस्थितिक और पारंपरिक कृषि ढांचे के लिए जोखिम भी पैदा कर रहा है।

आज अच्छे मकानों में सभी सुविधाओं के साथ रहना हर किसी का सपना है पर हम भूल जाते हैं कि मकान निर्माण में रेता और रोड़ी के अत्यधिक उपयोग और उनके खनन का जलवायु परिवर्तन पर सीधा और गंभीर असर पड़ता है। हर साल 40 बिलियन टन से अधिक रेत और बजरी का उपयोग निर्माण में होता है, जिससे नदी-तल और समुद्र तट खाली हो रहे हैं और पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ रहा है। नदी और समुद्र तटों से अंधाधुंध रेत निकालने से जलीय जीव-जंतु नष्ट हो रहे हैं और तटीय कटाव व भू-स्खलन जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
वैसे तो कहीं भी होने वाले निर्माण कार्य कार्बन उत्सर्जन के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार होते हैं। रेत के परिवहन और प्रसंस्करण में भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन जलता है, जो ग्रीनहाउस गैसों में वृद्धि करता है।

खेतों में रेता-रोड़ी की अत्यधिक मात्रा उपजाऊ मिट्टी की संरचना को खराब कर पैदावार में कमी लाती है। रेत या रोड़ी मिट्टी में जल धारण क्षमता कम करती है। रेतीली मिट्टी में पोषक तत्व कम होते हैं, जिससे फसलों का विकास धीमा हो जाता है। यह उत्पादकता में कमी लाती है।
रेतीली मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए भारी मात्रा में जैविक खाद, गोबर की खाद और कंपोस्ट का उपयोग करना चाहिए। पूर्व में घर गोबर से निर्मित हुआ करते थे जो खेती पर सकारात्मक प्रभाव डालते थे, यह वातावरण की दृष्टि से भी सकारात्मक होते थे पर आज ईंट कंक्रीट के घर बनने से खेती के साथ पर्यावरण में नकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है।
गोबर उत्तम जैविक खाद प्रदान करता है और हानिकारक रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करके भूमि की उर्वरता बढ़ाता है। यह एक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल कृषि मॉडल को बढ़ावा देता है।

गोबर के उपयोग से लाभ:
मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ को बढ़ाता है
इसके प्रयोग से सूक्ष्मजीव सक्रिय होते हैं
जलधारण क्षमता में सुधार के साथ टिकाऊ खेती होती है
खाद के उपयोग से रासायनिक उर्वरकों का उपयोग कम होता है
गोबर और गौमूत्र का उपयोग प्राकृतिक कीटनाशक के रूप में किया जा सकता है
फसलों को बिना नुकसान पहुँचाए हानिकारक कीटों से बचाता है
गोबर का उपयोग ग्रामीण अर्थव्यवस्था और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद है। वर्तमान समय में पत्थर की छत व गोबर से लीपे घर दिखाई नहीं देते, जो कभी पर्वतीय क्षेत्रों की शान हुआ करते थे। पर आज आधुनिकता के चलते लिंटर के घरों का निर्माण भारी मात्रा में होने से भले ही सुख शांति तो मिल रही है, पर कृषि व जलवायु पर नकारात्मक प्रभाव बढ़ रहा।

आधुनिक सुख सुविधा के चलते कृषकों द्वारा खेती कार्य को कम किया जा रहा है, जिसके चलसे पलायन का दर्द पहाड़ों को सहन करना पड़ रहा है।
आधुनिकरण होना चाहिए पर हमें परंपरागत खेती के साथ पूर्व पद्धतियों के साथ खेती को किया जाना चाहिए, जिससे आने वाला भविष्य अपनी पारंपरिक कृषि पद्धति से वंचित न रह सके। यदि होगी खेती में गोबर का साथ तो मिल सकेगा इस समस्या से निजात।
गोबर आधुनिक खेती की चुनौतियों का एक सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल समाधान है। परंपरागत पद्धतियों को अपनाकर और गोबर का उपयोग करके हम पर्वतीय क्षेत्रों की कृषि को बचा सकते हैं और पलायन की समस्या को कम कर सकते हैं।
हल्द्वानी, नैनीताल, उत्तराखंड
नरेन्द्र सिंह बिष्ट उत्तराखंड के सामाजिक, पर्यावरणीय और ग्रामीण विकास से जुड़े विषयों पर लेखन और रिपोर्टिंग करते हैं।