
जीवामृत गाय के गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और उपजाऊ मिट्टी से बनने वाला एक जादुई तरल जैविक उत्पाद है, जो मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाकर उन्हें सक्रिय करता है। यह मिट्टी की उपजाऊ क्षमता, जल धारण क्षमता, पौधों को आवश्यक पोषण देकर उत्पादन बढ़ाने के साथ कीट-रोगों से सुरक्षा प्रदान करता है जिसके प्रभाव से खेती में कम लागत के साथ लाभ मिलता है।
जीवामृत एक प्राकृतिक तरल खाद है जिसमें मुख्य रूप से नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश के साथ-साथ कार्बन, सूक्ष्म पोषक तत्व, लाभदायक एंजाइम और वृद्धि हार्मोन पाए जाते हैं।

जीवामृत शब्द दो शब्दों "जीवन" और "अमृत" से मिलकर बना है जीवन का अर्थ है जीवन और अमृत का अर्थ है औषधि अतः इसे "जीवन का अमृत" कहा जाता है, एक प्राकृतिक उर्वरक है जो लाभकारी सूक्ष्मजीवों की शक्ति का उपयोग करके खेतों को पुनर्जीवित करता है और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देता है। जीवामृत एक कम लागत वाला उत्पाद है जो मृदा को समृद्ध करता है, सूक्ष्मजीवों के विकास में मदद करता है और मृदा के खनिजीकरण को बढ़ाता है।
ग्राम सतखोल, नैनीताल, उत्तराखंड से संजय सिंह बिष्ट द्वारा विगत 01 वर्ष से स्वयं जीवामृत को बनाकर इसका उपयोग अपने बगीचे के साथ पेड़ पौधों पर किया जा रहा है। आरोही संस्था, सतोली नैनीताल द्वारा आयोजित आई.डी.बी.आई परियोजना में उन्हें विशेषज्ञ के रूप में अनुभवों को साझा करने का मौका दिया गया जिसमें उनके द्वारा बताया गया किस प्रकार इसे बनाया जाता है व किस मात्रा में उपयोग करते है।
उन्होंने सांझा किया जिन पौधों पर इसका प्रयोग किया गया उन पेड़ पौधों की ग्रोथ सामान्य पौध की अपेक्षा 80 प्रतिशत अच्छी हुई आज वह दूसरों के लिये प्रेरणा के श्रोत है उनके द्वारा अन्य काश्तकारों को जीवामृत प्रशिक्षण देकर जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।
जीवामृत बनाने के लिए 02 किलो ताजा गोबर, 02 लीटर ताजा गोमूत्र, 200 ग्राम बेसन, 200 ग्राम गुड़ और 100 ग्राम मिट्टी का उपयोग किया जा सकता है। ध्यान रखें गोबर गोद की मात्रा समान होगी वहीं गुड़ व बेसन इसके अनुपात में 10 प्रतिशत व मिट्टी 05 प्रतिशत में ली जानी चाहिए।
इन सभी सामग्रियों को एक साफ, बड़े प्लास्टिक बर्तन में अच्छी तरह मिला लें, फिर उसे जूट की बोरी से ढक दें या किसी छायादार जगह पर रख दें और लकड़ी की छड़ी से बर्तन को दक्षिणावर्त और वामावर्त दिशा में चलाते रहें। इस प्रक्रिया को दिन में दो बार दोहराएं और 7 दिनों तक खमीर उठने दें। 7 दिनों के बाद यह उपयोग के लिए तैयार है।

जीवामृत एक अच्छा और पोषक तत्व है सिंचाई के माध्यम से खेत में जीवामृत का उपयोग किया जाता है। जीवामृत को 1:4 के अनुपात में पानी में घोला जाता है (1 लीटर जीवामृत और 4 लीटर पानी) जीवामृत को पानी में घोलकर पौधे पर डाला जाता है। अधिक मात्रा में जीवामृत डलने पर पौधे को कोई नुकसान नहीं होता है।
यदि कोई सिंचाई प्रणाली के माध्यम से खेती करते है वह जीवामृत को पानी में घोलकर खेत में डाल सकते है। और यदि गमले में पौधा हो तो जीवामृत का मिश्रण पौधे की जड़ में डालना चाहिए।
नर्सरी में जीवामृत का छिड़काव करें और मुख्य खेतों में हर रात सिंचाई करें, पूरी खेती अवधि के दौरान रासायनिक उर्वरकों या कीटनाशकों का प्रयोग नहीं करना पड़ेगा।

जीवामृत एक जैविक उर्वरक है जो नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम और अन्य सभी सूक्ष्म पोषक तत्वों का एक समृद्ध स्रोत है, जो पौधों की वृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। यह मिट्टी के पीएच को बनाए रखता है, मिट्टी में वायु संचार में सुधार करता है और पौधों की वृद्धि के लिए लाभकारी जीवाणुओं को बढ़ाता है।

जीवामृत आवश्यक पोषक तत्वों और कार्बनिक पदार्थों से मृदा को समृद्ध करके उसकी उर्वरता में सुधार करता है। जीवामृत में मौजूद सूक्ष्मजीव जटिल कार्बनिक यौगिकों को सरल रूपों में तोड़ देते हैं, जिससे वे पौधों के लिए आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। यह प्रक्रिया पोषक तत्वों के अवशोषण को बढ़ाती है, जिससे स्वस्थ और अधिक उत्पादक फसलें प्राप्त होती हैं।
जीवामृत में मौजूद सूक्ष्मजीव हानिकारक कीटों और रोगों के खिलाफ प्राकृतिक प्रतिरोधक के रूप में कार्य करते हैं। यह प्राकृतिक रक्षा तंत्र रासायनिक कीटनाशकों पर निर्भरता को कम करता है, जिससे जीवामृत एक पर्यावरण अनुकूल विकल्प है।
जीवामृत कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करके सतत कृषि को बढ़ावा देता है। इसके उपयोग से रासायनिक पदार्थों से जुड़े नकारात्मक पर्यावरणीय प्रभावों, जैसे जल प्रदूषण और मृदा क्षरण कम होता है। इसके अतिरिक्त, जीवामृत को स्थानीय रूप से उपलब्ध सामग्रियों के उपयोग से तैयार किया जा सकता है, जिससे यह सीमित संसाधनों वाले किसानों के लिए एक किफायती समाधान है।
चावल, गेहूं, गन्ना और मक्का सबसे अधिक पोषक तत्वों की खपत करने वाली फसलें हैं जिनमें अधिक मात्रा में उर्वरक की आवश्यकता होती है, लेकिन इससे मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट आती है और फसलों की उत्पादकता कम हो जाती है। इस प्रकार की समस्या से निपटने के लिए जीवामृत जैसे जैविक उर्वरकों का उपयोग कर रहे हैं ताकि फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार हो सके।
जीवामृत वास्तव में जैविक खेती के लिए किसी अमृत से कम नहीं इसका प्रयोग काश्तकारों द्वारा अपनी खेती में अवश्य किया जाना चाहिए यह जैविक खेती की दिशा में एक सकारात्मक पहल होगी। जैविक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से आज पर्वतीय क्षेत्रों में जीवामृत का उपयोग किया जा रहा है जिसके चलते सकारात्मक परिणाम भी देखने को मिल रहे है।
हल्द्वानी, उत्तराखंड
नरेन्द्र सिंह बिष्ट उत्तराखंड के सामाजिक, पर्यावरणीय और ग्रामीण विकास से जुड़े विषयों पर लेखन और रिपोर्टिंग करते हैं।